उतरौला की रामलीला गंगा–जमुनी संस्कृति और पारस्परिक एकता की सजीव मिसाल है।
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जनपद स्थित उतरौला कस्बे की रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकता का जीवंत प्रतीक है। यहां रामलीला का शुभारम्भ वर्ष 1904 में हुआ था। इसकी आधारशिला संत बाबा जयकरण गिरि ने मुगल शासक राजा मुमताज़ अली ख़ाँ के काल में रखी थी। राजा मुमताज़ अली ख़ाँ ने रामलीला के मंचन हेतु भूमि प्रदान की थी, जिससे इस आयोजन को स्थायी स्वरूप प्राप्त हुआ। तब से लेकर आज तक यह रामलीला निरन्तर प्रति वर्ष आयोजित होती आ रही है। इतना ही नहीं, यह उत्सव अब नगर की ऐतिहासिक धरोहर तथा लोक-संस्कृति का अविभाज्य अंग बन चुका है। आरम्भिक काल में रामलीला का सम्पूर्ण आयोजन स्थानीय कलाकारों द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता था। पण्डित सूर्यमन पाण्डेय, पण्डित महावीर प्रसाद झा तथा पण्डित वृजलाल महाराज जैसे कलाकारों ने अपने उत्कृष्ट अभिनय से रामलीला को विशिष्ट पहचान प्रदान की। विशेष रूप से हनुमान के पात्र का सशक्त एवं प्रभावपूर्ण अभिनय दर्शकों के हृदय में अमिट छाप छोड़ जाता था। संत जयकरन गिरि महाराज के उत्तराधिकारी तथा वर्तमान में दुखहरणनाथ मंदिर के पुजारी मयंक गिरि...