उतरौला की रामलीला गंगा–जमुनी संस्कृति और पारस्परिक एकता की सजीव मिसाल है।
राजा मुमताज़ अली ख़ाँ ने रामलीला के मंचन हेतु भूमि प्रदान की थी, जिससे इस आयोजन को स्थायी स्वरूप प्राप्त हुआ। तब से लेकर आज तक यह रामलीला निरन्तर प्रति वर्ष आयोजित होती आ रही है। इतना ही नहीं, यह उत्सव अब नगर की ऐतिहासिक धरोहर तथा लोक-संस्कृति का अविभाज्य अंग बन चुका है।
आरम्भिक काल में रामलीला का सम्पूर्ण आयोजन स्थानीय कलाकारों द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता था। पण्डित सूर्यमन पाण्डेय, पण्डित महावीर प्रसाद झा तथा पण्डित वृजलाल महाराज जैसे कलाकारों ने अपने उत्कृष्ट अभिनय से रामलीला को विशिष्ट पहचान प्रदान की। विशेष रूप से हनुमान के पात्र का सशक्त एवं प्रभावपूर्ण अभिनय दर्शकों के हृदय में अमिट छाप छोड़ जाता था।
संत जयकरन गिरि महाराज के उत्तराधिकारी तथा वर्तमान में दुखहरणनाथ मंदिर के पुजारी मयंक गिरि के अनुसार, हनुमान जी का मुखौटा काशी में तैयार कराया गया था और वर्ष 1962 में उसे उतरौला लाया गया। उसी समय से ब्राह्मण समुदाय के कलाकार ही हनुमान जी की भूमिका का निर्वहन करते आ रहे हैं। पूर्वकाल में लालटेन तथा मशालों की मद्धिम रोशनी में रामलीला का प्रदर्शन होता था, जो दर्शकों के लिए अत्यन्त अनोखा और मनोहर अनुभव प्रदान करता था।
सन् 1996 के उपरान्त रामलीला मंचन में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला। स्थानीय कलाकारों के स्थान पर बाहरी प्रतिष्ठित नाट्यमंडलियों ने प्रस्तुति देना आरम्भ किया। सर्वप्रथम अयोध्या धाम से महावीर प्रसाद झा की मंडली यहां पहुँची। इसके पश्चात चित्रकूट धाम की ‘आदर्श नाट्य कला उत्थान समिति’ सहित अनेक सुविख्यात मंडलियाँ भी यहाँ नियमित रूप से आने लगीं। आधुनिक युग में विद्युत व्यवस्था, साउंड सिस्टम तथा इलेक्ट्रॉनिक झालरों के प्रयोग ने मंचन को और अधिक भव्य स्वरूप प्रदान किया है, जिससे रामलीला का आकर्षण निरन्तर बढ़ रहा है।
हनुमान की भूमिका रहती है प्रमुख आकर्षण
उतरौला की रामलीला में हनुमान का चरित्र अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। पण्डित महावीर द्वारा प्रस्तुत किया गया हनुमान का रूप आज भी लोगों की स्मृतियों में सजीव है। उनका अभिनय इतना सशक्त और हृदयस्पर्शी होता था कि दर्शकों की आँखें स्वतः ही नम हो उठती थीं। हनुमान जी का विशिष्ट मुखौटा तथा उनका प्रभावपूर्ण प्रस्तुतीकरण आज भी इस रामलीला की पहचान बना हुआ है।
उतरौला की रामलीला केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि इसमें स्थानीय जनता की गहरी आस्था, भावनाएँ और परम्पराएँ गुंथी हुई हैं। यही कारण है कि यह आयोजन आज भी हिन्दू–मुस्लिम सौहार्द और गंगा–जमुनी संस्कृति का दृढ़ प्रतीक बना हुआ है।

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