AI ने बनाया नया वायरस: मेडिकल साइंस की बड़ी क्रांति या मानव जाति के लिए नया खतरा?
जहाँ एक तरफ इसे 'एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट' सुपरबग्स के खिलाफ मेडिकल साइंस की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ग्लोबल बायो-सिक्योरिटी को लेकर दुनिया की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
AI मॉडल ने कैसे तैयार किया वायरस का DNA?
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) और आर्क इंस्टीट्यूट (Arc Institute) के वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च को अंजाम दिया है।
Evo 1 और Evo 2 मॉडल्स: इस प्रोजेक्ट में Evo नाम के एडवांस्ड AI मॉडल्स का इस्तेमाल किया गया।
प्रेडिक्टिव जेनेटिक कोडिंग: जिस तरह ChatGPT जैसे भाषा मॉडल अगले शब्द का अनुमान लगाते हैं, ठीक उसी तरह Evo मॉडल DNA की अगली जेनेटिक संरचना (Genetic Sequence) का अनुमान लगाकर नया DNA डिजाइन करता है।
300 से ज्यादा नए डिजाइन: करोड़ों प्राकृतिक
जीनोम और \PhiX174 वायरस के डेटा पर ट्रेनिंग देने के बाद, AI ने हजारों संभावित जेनेटिक डिजाइन तैयार किए। इनमें से वैज्ञानिकों ने 300 डिजाइन चुने और लैब में उनका सिंथेटिक DNA बनाया।
लैब टेस्ट में सफलता: परीक्षण के दौरान 16 AI-डिजाइन किए गए वायरस सक्रिय पाए गए और उन्होंने पेट्री डिश में बैक्टीरिया को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया।
एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया (Superbugs) का खात्मा?
आज पूरी दुनिया एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया (Superbugs) की समस्या से जूझ रही है—यानी ऐसे संक्रमण जिन पर सामान्य दवाएं काम करना बंद कर देती हैं।
बैक्टीरियोफेज थेरेपी (Bacteriophage Therapy): AI द्वारा बनाए गए ये वायरस 'फेज' (Phages) की तरह काम करते हैं, जो सिर्फ विशिष्ट बैक्टीरिया पर हमला करते हैं।
इंसानों के लिए पूरी तरह सुरक्षित: राहत की बात यह है कि ये वायरस केवल बैक्टीरिया को संक्रमित करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इनकी ट्रेनिंग में इंसानी बीमारियों का कोई डेटा शामिल नहीं था, इसलिए ये इंसानों, जानवरों या पौधों को
नुकसान नहीं पहुँचा सकते।
क्या यह भविष्य का नया जैविक खतरा (Biosecurity Threat) है?
इस उपलब्धि के साथ ही दुनिया भर के बायो-एथिक्स एक्सपर्ट्स और सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं।
चिंता के 3 बड़े कारण:
- ओपन-सोर्स मॉडल (Open-Source Risk): Evo मॉडल एक ओपन-सोर्स AI है, यानी इसे इंटरनेट से कोई भी डाउनलोड कर सकता है। अगर इसका गलत इस्तेमाल हुआ तो कोई भी हानिकारक जेनेटिक कोड बना सकता है।
- ग्लोबल गाइडलाइंस की कमी: AI द्वारा जेनेटिक बायो-मटीरियल डिजाइन करने को लेकर फिलहाल दुनिया में कोई स्पष्ट वैश्विक नियम या सख्त नीतियां मौजूद नहीं हैं।
- भविष्य के जटिल वायरस: हालांकि अभी यह तकनीक बेहद छोटे और सरल जीनोम तक सीमित है, लेकिन शोधकर्ताओं ने माना है कि भविष्य में जटिल और बड़े जीनोम वाले वायरस बनाना असंभव नहीं होगा।
AI का यह
नया प्रयोग मेडिकल साइंस के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरा है, खासकर उन बीमारियों के इलाज के लिए जहाँ दवाएं बेअसर हो चुकी हैं। हालांकि, तकनीक जितनी शक्तिशाली होती है, उसका जोखिम भी उतना ही बड़ा होता है। भविष्य में इस तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त AI बायो-सिक्योरिटी प्रोटोकॉल लागू करना बेहद जरूरी हो गया है।

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